कलम चलती रहे उसी तरह, जैसे चलती हैं सांसें…

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कलम चलती रहे उसी तरह, जैसे चलती हैं सांसें
जैसे नदी बहती है लगातार

जैसे पंछी हर रोज भरते हैं मीलों लंबी उड़ान
जैसे हर रोज उनींदी नींद में की जाती है दुआएं

जैसे हर रोज़ मस्जिद से आती है अज़ान
कलम चलती रहे उसी तरह, जैसे चलती हैं सांसें

जैसे मंदिरों में हर रोज़ गूंजती है घंटों की आवाज़
तुम मरने न देना अपने अंदर छुपे शब्दों को

लिखती रहना हर रोज़
वो सब भी जो कहती नहीं किसी से

और वो भी जो बताना चाहती हो सभी से
वैसै जैसे हर रोज़ पुजारी करता है मंत्रोच्चार

सफेद कागज़ को काला करना फितरत है तुम्हारी
तुम बदलना नहीं अपनी फितरत

लिखती रहना हर रोज़

हर्षित गौतम (नई दिल्ली)

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