प्रेम

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मैं बचाव नहीं कर पाई
अपने भावों का
जिसमें बहता ही रहा प्रेम!
 बावरी होकर मैंने तुझे अपना सबकुछ मान लिया
 जैसे मान लेता है एक भक्त अपने ईश्वर को
 क्या ईश्वर का काम सिर्फ़ सुनना ही रहता है?
वो सुन ही रहा है
और तू भी अब सिर्फ़ सुनता ही है
सिर्फ़ सुनना ही काफ़ी होता है
आगे की ज़िंदगी भी तुम सुनकर ही निकाल दोगे?
तुम्हारे अंदर जो बदलाव आया हैना
उसको मैं नज़र अंदाज़ नहीं कर सकती
क्यूंकि तुमने मुझे मानसिक तौर पर जीता था
मेरा विश्वास मानो
मैं एक टक सब छोड़ सकती हूं
मगर बदलाव के घातों को नहीं छोड़ सकती
मेरे निश्छलता के भाव पर सिर्फ़ सुनना
ये तुम्हारे लिए सामान्य होगा
मेरे लिए बिल्कुल भी सामान्य नहीं है।
जिससे तुम जबर्दस्ती का जुड़ाव दिखाकर
अपने मन को संतुष्ट करने का प्रयत्न करके
जीने की कोशिश करते हो
कितने पेंचीदा वृक्ष बन गए हो
जिस पर मुझे हंसी नहीं
दया आती है
अनदेखी, आकर्षण, और समय देकर
तुम बेचैन से जो फिरते होना
वो सिर्फ़ तुम्हारी स्वयं की बनाई इक चाल है
तुम्हें उन पर ख़ासा विश्वास हो रहा
जो अभी अभी आए है
वो भी तब
जब तुम उन्हें बार-बार पनाह देते हो।
मुझे तुमसे चिढ़ होती है बहुत ज़्यादा
अचानक से
एक राक्षस राम पथ पर चलने की कोशिश कर रहा है
आज उसे मेरा मोह
खाली लगता है
मेरी बातें सिर्फ़ बातें लगती है
मेरे ख़त सिर्फ़ एक जानकारी लगता है
पर  तुम मानों या ना मानों
तुमने जो सीधे बनकर
मुझे पुचकारा हैना
उससे मैं
अब  शापित हो  चुकी हूं
और शापित कन्या का श्राप सदैव ख़ुद के लिए ही
लगता है आजीवन ना खुश रहने का!
विभा परमार
भोपाल

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