वतन खड़ा था बिकने को

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है खुशखबरी बाजार लग गया धूर्त इरादों से है सज गया खादी से पटवास लगे वर्दी से रंग उतरने को धोखे के तवे पर रखी गई मतलब की रोटी सिकने को मेरे वतन की बोली लगती रही उस दुकां खड़ा था बिकने को 


उदय हुआ उस दिन भी सूरज शाम हुए बिन ही ढल गया मंद पड़ा बाज़ार गुनाह का उस दिन तेज़ी से चल गया था कोई वहशी नाम गुरू किस तरह से दिल्ली पहुंच गया  जब अपनो का ही हाथ लगा गद्दार का तंबू कसने को आज़ादी मांगता छोड़ गया कुछ बच्चे यहाँ पर पलने को मेरे वतन की बोली लगती रही उस दुकां खड़ा था बिकने को 


फिर वही था क्षण दोहरा गया इक नया खरीदार आ गया नादान उम्र छोटा कसाब इक नया तमाशा दिखा गया पीतल की कीमत सिखा गया रक्त बहा था खाकी का ना सुनता कोई दलीलों को और नमस्कार उस न्याय सभा उपहास मे लीन वकीलों को बस अभी चढ़ा है रंग मज़हबी वक्त लगेगा दिखने को मेरे वतन की बोली लगती रही उस दुकां खड़ा था बिकने को 


मिली रोशनी किस्मत में पर आँखों से अंधिया गयाइस बार खरीदी करने खुद यहीं का उपजा आ गयासरेराह फिर लुटी थी इज्जत मर्द बड़ा शर्मा गयालुटी देख दिल्ली की अस्मत देश को रोना आ गयाना मिला चीर का टुकड़ा ढकने उसके खून सने तन कोमेरे वतन की बोली लगती रही उस दुकां खड़ा था बिकने को


यह वतन नहीं है पीरों का ना धर्म इसे कोई बना गया न वसीयत है खादी की खून का कतरा कतरा गिना गया जब पायी सरहद कुर्सी की सरहद को ही वह भुला गया ठगा गया यह देश मौका फिर कोई खादी भुना गया टोपी की नोंक से दिखते रहे दीवार मिली है छिपने को मेरे वतन की बोली लगती रही उस दुकां खड़ा था बिकने को 


नींद लगी कुछ स्वप्न रात में कोई सैनिक देख गया सोता शेर को देख कोई सीना गीदड़ छेद गया इसमे भी खादी भुना गया गलती वहीं शेर की सुना गया लाश हुआ वो शेर दहाड़ा गज़ब बताया सपने को बड़ी मुबारक नींद मिली ना शौक सुबह का जगने को मेरे वतन की बोली लगती रही उस दुकां खड़ा था बिकने को 


इन घुप्प अंधेरों के बीचों मे कौन रोशनी लाएगा बुझी आग जो इज़्जत की कौन उसे सुलगाएगा मिलेंगे कुछ कंधे हिम्मत के सफल चमन हो जाएगा नफरत की आंधी थमती चहुँओर अमन हो जाएगा शिथिल पड़ा कमज़ोर हौसला इंकलाब दिखलाएगा भारत मां का वह सपूत वही देशभक्त कहलाएगा 


जो छूट गए उन बच्चों को शपथ खाए सच्चों को ताकत के अंधे कच्चों को वह इक ललकार लगाएगा 
ना पैर रहेंगे टिकने को ना आंख रहेंगी तकने को मेरे वतन की बोली नहीं लगेगी चमन नहीं मेरा बिकने को वतन नही मेरा बिकने को विश्वास नहीं है डिगने को अभिमान नहीं है झुकने को मेरे वतन की बोली नहीं लगेगी वतन नहीं मेरा बिकने को 
 ~ निसर्ग दीक्षित

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