तुम क्यों नहीं समझती टूटते इश्क की मजबूरी

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मैं तुम्हारी मनमर्जियों में ख़ुद को महसूस करता हूं असहाय सा....
ऐसा शख्स जिसे दी गई हो उम्र कैद की सज़ा..
उसका इश्क दम तोड़ रहा हो उसी के सामने...
तुम्हारी मनमर्जियां जिद्दी नहीं हैं
पर तुम्हारा क्यों ज़ोर नहीं चलता इन पर
मैं कहा करता था तुम नदी जैसी हो...
फिर नदी की धारा को कोई कैसे मोड़ सकता है..
तुम्हारी मर्जी के खिलाफ कोई कैसे
अपना हक़ जता सकता है.....
तुम मुझसे कह जाती हो बडी़ ही साधारण
भाषा में वो सब जो किसी से नहीं कहती....
तुम्हें लगता है मैं समझ लूंगा तुम्हारी मजबूरी
पर तुम क्यों नहीं समझती टूटते इश्क की मजबूरी
क्या तुम्हारे कानों तक रुंधे गले की चीख नहीं पहुंचती...
नहीं दिखाई देता वो स्याह होता आकाश...
जहां चील-कौव्वे मेरे और तुम्हारे इश्क को नोच रहे हैं...
गर्म रेत पर जैसे पांव ठहरते नहीं....
वैसे ही कभी-कभी मेरा इश्क भी सहन नहीं कर पाता
नहीं समझ पाता तुम्हारी मजबूरी...
बस तड़प कर रह जाता है, इस आस में...
कि तुम भी समझोगी इसे और इसकी मजबूरी..

हर्षित गौतम (नई दिल्ली)

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