राष्ट्रवाद,अति राष्ट्रवाद और छद्म राष्ट्रवाद

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14 फ़रवरी 2019, वैसे तो यह दिन प्यार के नाम रहता है पर भारत मे इस दिन सब सामान्य ना रह सका क्योंकि पुलवामा कश्मीर में एक पाक प्रायोजित फ़िदायीन हमले में सीआरपीएफ़ के 45 जवान शहीद हो गए।  यह बहुत ही त्रासद और दुःखद है पर यह भी कटु सत्य है कि भारत मे इंसान की ज़िंदगी की क़ीमत कुछ नही है और किसी घटना में यदि दो चार मौतें होती भी है तो शोर नही मचता, शोर तभी मचता है जब मरने वालों की संख्या ज्यादा हो फिर चाहे वो कोई सिविलियन हादसा हो या सुरक्षाबलों के खिलाफ हमला। कहना नही चाहिये पर यदि इस दिन 45 की जगह 4 या 5 जवान शहीद होते तो कोई हंगामा नही मचता और सब सामान्य ही रहता और मचे भी कैसे क्योंकि जैसा मैंने पहले कहा कि भारत मे इंसान की जान बड़ी सस्ती है, अरे 400 लोग तो यहाँ रोज़ सड़क हादसों में काल कवलित होते है पर वे एक साथ एक जगह काल का ग्रास नही बनते इसलिए चर्चा नही होती। अरे रोज़ाना 10 लोग तो अकेले मुंबई उपनगरीय लोकल ट्रेनों में गिर कर अपनी जान गवाँ देते है।

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अब बात करें पुलवामा की तो यहाँ भारतीय जनमानस उबल पड़ा और इसकी परिणति सोशल मीडिया पर पाकिस्तान के साथ एक समानांतर युद्ध चलाकर और कैंडल लाइट मार्चों के रूप में हुई वह भी शायद इसलिए क्योंकि हमला सी आर पी एफ़ जवानों पर था और इसमें कश्मीर तथा पाकिस्तान ऐंगल था  और लोग सरकार से पाकिस्तान के साथ आर पार की लड़ाई की बात करने लगे पर यदि थोड़ा पीछे जाएं तो सन 2010 में भी एक हमले में सी आर पी एफ़ के ही 76 जवान एक दुर्दांत हमले में शहीद हुए थे पर तब ना इतना शोर मचा ना पाकिस्तान का नाम आया क्योंकि यह एक नक्सली हमला था और दंतेवाड़ा छत्तीसगढ़ में हुआ था इसलिए शायद लोग ठंडे पड़ गए पर क्यों भाई यहाँ जानें नही गयी थी क्या? अब यदि कश्मीर और नक्सल समस्या की तुलना करें तो मौतों और नुक्सान के मामलें में कश्मीर थोड़ा ही आगे है नक्सली मूवमेंट से, पर चूंकि कश्मीर में शायद पाकिस्तान एंगल है और कहीं ना कहीं अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़ा है इसलिए उत्तेजना ज्यादा है फिर चाहे वो शासक वर्ग हो या सामान्य जनमानस।

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अब आते हैं सोशल मिडिया पर और इस पर फैले अति राष्ट्रवाद की गंध पर, जी हाँ गंध ही कहूँगा मैं। लोग ऐसे जोश में हैं कि एक वीर रस का कवि भी शरमा जाए और ऐसे जैसे मानो ये लोग रात को ही कारगिल की ड्यूटी से लौटे हों और अगले दिन सियाचिन की ड्यूटी बजाना हो जबकि हकीकत में तो स्कूल में स्काउट गाइड तक जॉइन नही किया होगा और यदि कॉलेज में एनसीसी शौकिया भी गए होंगे तो इसलिये की संडे की परेड में दो आलूगोण्डे मिलेंगे और यदि धोके से सी सर्टिफिकेट मिल गया तो सरकारी नौकरी में आरक्षण मिल जाएगा।  कुछ भी उल जुलूल बके जा रहे हैं जैसे पत्थरबाजों पर गोली चला दो। ठीक है चला देतें है तो फिर इस हिसाब से तो फर्ज़ी बाबा राम रहीम के गिरफ्तारी स्वरूप भड़की उग्र समर्थकों पर भी गोली चलनी चाहिये जिन्होंने खुलेआम पुलिस वालों पर हमला किया। अपनी जाति के लिए आरक्षण माँगना आजकल फैशन में है और आये दिन प्रदर्शनकारी खुलेआम बसें और सरकारी संपत्ति जलाते हैं, इन पर भी गोली चलनी चाहिये। फिर आखिर ये दोहरा मापदंड क्यों?  ऐसा करके और एक विशेष अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाकर हम अपने सामाजिक ताने बाने और गंगा जमनी तहज़ीब को तोड़ रहे हैं। अंग्रेजी में एक कहावत है कि “you can’t paint everyone with the same brush” लोगों को विशेषकर बहुसंख्यक समाज को ये बात समझनी होगी। कल ही एक पोस्ट देखी जिसमे एक नेता की मज़म्मत हो रही है क्योंकि वो हिन्दू होकर एक मज़ार पर ज़ियारत कर रहा है। क्यों भाई उसकी मर्ज़ी। क्या ऐसा करने से वो देशद्रोही हो गया यदि ऐसा है तो मैं भी हैदराबाद की मक्का मस्जिद में माथा टेक चुका हूँ तो फिर मैं भी देश  द्रोही हूँ। वही नेता यदि सर पर कपड़ा बाँधकर गुरुद्वारे से निकले तो कोई आलोचना नही होती। यह सब बहुत घातक है और हमें इस पर सोचना होगा।

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अब आते है छद्म राष्ट्रवाद पर। कई धरना प्रदर्शन और मोमबत्ती मार्च हो रहे हैं। ठीक भी है भले इससे ट्रैफिक जाम हो या बैनर लगाने के लिए सड़क खोदनी पड़े क्योंकि ऐसा करके हम खुद को देशभक्ति का सेल्फ अटेस्टेड सर्टिफिकेट दे देते हैं। मानो कोई गंगा बह रही हो और जो चाहे वह अपने पाप धो रहा हो। कल ही देखा कि सहारा इंडिया परिवार केंडिल मार्च निकाल रहा है जिनके कर्ता धर्ता खुद आम निवेशकों का हज़ारो करोड़ो रूपये का घपला कर बैठे हैं और ना जाने आजकल जेल में हैं या बेल पर। ये और ना जाने इनके जैसे कितने ही देशभक्त बनने चले है। ठीक है भाई की राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट।  मैं तो कहूँगा की असली देशभक्ति तो यह है कि हम अपना कर ईमानदारी से भरें और दैनिक जीवन मे सिविक नियमों का उल्लंघन ना करें। कार चलाते समय सीटबेल्ट और दो पहिया चलाते समय हेल्मेट ही पहन लें तो देश के ऊपर उपकार होगा। बाकी सीमा और आंतरिक सुरक्षा शासन और सेना पर छोड़ दें उन्हें जो करना होगा वो कर लेंगी, उन पर भरोसा रखें।

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अंत मे यही कहूंगा कि युद्ध कोई रास्ता नही है चाहे इसके लिए आप मुझे भीरुं कहे पर सच तो यही है कि “An eye for an eye will make whole world blind”
जय हो

भूषण पंडित

10 COMMENTS

  1. भूषण भाई बहुत ही सारगर्भित लेख है और आत्मावलोकन की आवश्यकता है सभी को, सत्य का सही परीक्षण और आंकलन की आवश्यकता है और आपने किया उसके लिए साधुवाद।

  2. भूषण जी हो सकता है कि मैं आपके विचारों से पूर्णरूपेण इत्तेफाक
    नहीं रखता परंतु आपका लेखन उच्च कोटी का है बधाई

    • धन्यवाद अतुल। असहमति में सहमति ही लोकतंत्र की खूबी है।

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